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ICSE Class 10 Hindi (Ekanki Sanchay) • Chapter Notes
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मातृभूमि का मान (Matri Bhoomi Ka Man)

matri bhoomi ka man
एकांकी परिचय

लेखक: हरिकृष्ण 'प्रेमी'
मूल विषय: अपनी मातृभूमि के प्रति असीम प्रेम, देशभक्ति और स्वाभिमान की रक्षा के लिए प्राणों का बलिदान।
पात्र परिचय:

एकांकी का विस्तृत सार (Summary)

1. मेवाड़ और बूँदी का संघर्ष

एकांकी की शुरुआत में महाराणा लाखा (मेवाड़ के शासक) का सेनापति अभय सिंह, बूँदी के शासक राव हेमू के पास जाता है। वह राव हेमू से कहता है कि बूँदी को मेवाड़ की अधीनता स्वीकार कर लेनी चाहिए ताकि पूरा राजपूताना एक शक्तिशाली झंडे के नीचे आ सके। परंतु राव हेमू एक स्वाभिमानी शासक है। वह कहता है कि हाड़ा राजपूत किसी के गुलाम नहीं बन सकते, वे स्वतंत्र ही रहेंगे। इस बात से क्रोधित होकर महाराणा लाखा बूँदी पर आक्रमण कर देते हैं, परंतु हाड़ा राजपूतों की वीरता के सामने मेवाड़ की सेना को हार का सामना करना पड़ता है और महाराणा लाखा को भागना पड़ता है।

matri bhoomi war council

2. महाराणा लाखा की भीषण प्रतिज्ञा

इस हार से महाराणा लाखा बहुत क्रोधित और अपमानित महसूस करते हैं। गुस्से में आकर वे एक भयानक प्रतिज्ञा ले लेते हैं— "जब तक मैं बूँदी के दुर्ग (किले) में ससैन्य प्रवेश नहीं कर लूँगा, तब तक मैं अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा।" यह प्रतिज्ञा सुनकर सभी दरबारी और सेनापति चिंतित हो जाते हैं क्योंकि बूँदी को जीतना कोई आसान काम नहीं था। अगर महाराणा अन्न-जल नहीं ग्रहण करेंगे, तो उनके प्राणों को संकट हो सकता था।

3. नकली बूँदी के किले का निर्माण

महाराणा की जान बचाने और उनकी प्रतिज्ञा को पूरा करने के लिए सेनापति अभय सिंह एक योजना बनाता है। वह मेवाड़ के ही मैदान में मिट्टी का एक नकली बूँदी का किला बनवाता है। योजना यह होती है कि महाराणा लाखा इस नकली किले पर आक्रमण करेंगे, उसे गिराएँगे और इस तरह उनकी प्रतिज्ञा पूरी मान ली जाएगी और वे अन्न-जल ग्रहण कर सकेंगे।

4. वीर सिंह का विद्रोह और बलिदान

मेवाड़ की सेना में वीर सिंह नाम का एक सैनिक था, जो मूल रूप से बूँदी (हाड़ा राजपूत) का रहने वाला था। जब उसे पता चलता है कि मेवाड़ के लोग उसकी मातृभूमि 'बूँदी' का एक नकली किला बनाकर उसका अपमान करने जा रहे हैं, तो उसका स्वाभिमान जाग उठता है। वह कहता है कि हाड़ा राजपूतों के लिए उनकी मातृभूमि का मिट्टी का किला भी उतना ही पवित्र है जितना कि असली। वह अपने कुछ हाड़ा साथियों के साथ उस नकली किले के अंदर चला जाता है और महाराणा लाखा की सेना का डटकर मुकाबला करता है। एक नकली किले की रक्षा करते-करते वीर सिंह और उसके सभी साथी अपने प्राणों का बलिदान दे देते हैं।

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5. महाराणा लाखा का हृदय परिवर्तन

वीर सिंह के इस बलिदान को देखकर महाराणा लाखा स्तब्ध रह जाते हैं। उनकी आँखें खुल जाती हैं। वे महसूस करते हैं कि जिस भूमि के लोग एक नकली किले की रक्षा के लिए भी अपने प्राण दे सकते हैं, उस भूमि को कभी जीता या गुलाम नहीं बनाया जा सकता। महाराणा लाखा का अहंकार टूट जाता है, वे वीर सिंह के शव के पास जाकर उसके चरणों की धूल माथे से लगाते हैं और बूँदी से हमेशा के लिए शत्रुता समाप्त करने का संकल्प लेते हैं।

एकांकी का उद्देश्य / संदेश

इस एकांकी का मुख्य उद्देश्य देशभक्ति और मातृभूमि के प्रति असीम प्रेम की भावना को जगाना है। लेखक ने वीर सिंह के माध्यम से यह संदेश दिया है कि जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान होती है। चाहे वह मिट्टी का एक नकली रूप ही क्यों न हो, किसी भी सच्चे देशप्रेमी के लिए उसकी मातृभूमि का अपमान असहनीय होता है। इसके साथ ही यह एकांकी आपसी कलह और घमंड (जैसे महाराणा लाखा का अहंकार) से दूर रहकर एकता और स्वाभिमान के साथ जीने का संदेश देती है।

परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्न (PYQs)

प्रश्न 1 महाराणा लाखा ने क्रोध में आकर क्या प्रतिज्ञा की थी?
उत्तर: जब महाराणा लाखा की सेना बूँदी के हाड़ा राजपूतों से हारकर वापस लौट आई, तो वे स्वयं को बहुत अपमानित महसूस करने लगे। अपने इसी अपमान और क्रोध की ज्वाला में जलते हुए उन्होंने प्रतिज्ञा की कि "जब तक मैं बूँदी के दुर्ग (किले) में अपनी सेना के साथ प्रवेश नहीं कर लूँगा, तब तक मैं अन्न-जल ग्रहण नहीं करूँगा।"
प्रश्न 2 नकली बूँदी का किला क्यों बनवाया गया था?
उत्तर: महाराणा लाखा की कठोर प्रतिज्ञा (अन्न-जल त्यागने की) को जल्द-से-जल्द पूरा करने और उनके प्राणों की रक्षा करने के लिए नकली बूँदी का किला बनवाया गया था। योजना यह थी कि महाराणा इस नकली किले पर आक्रमण करके इसे जीत लेंगे, जिससे उनकी प्रतिज्ञा नाम मात्र के लिए पूरी हो जाएगी और वे भोजन-पानी ग्रहण कर सकेंगे, क्योंकि असली बूँदी को तुरंत जीतना असंभव था।
प्रश्न 3 वीर सिंह ने नकली बूँदी के किले की रक्षा क्यों की? इसके लिए उसने क्या किया?
उत्तर: वीर सिंह जन्म से बूँदी का एक हाड़ा राजपूत था और अपनी जन्मभूमि से बहुत प्रेम करता था। वह यह सहन नहीं कर सकता था कि उसकी आँखों के सामने कोई उसकी मातृभूमि 'बूँदी' (चाहे वह मिट्टी का नकली रूप ही क्यों न हो) का मज़ाक उड़ाए या उसे अपमानित करके नष्ट करे। इसलिए अपने स्वाभिमान और मातृभूमि के सम्मान की रक्षा के लिए वह अपने कुछ साथियों के साथ नकली किले में जा डटा और महाराणा की बड़ी सेना का सामना करते हुए अंततः अपने प्राणों का बलिदान दे दिया।